Monday, 11 August 2014

रात


गुमसुम पड़ी-सी सांस लेती रात

जागती-सी,सोचती-सी,अधखुली-सी रात


मातखाई,कुनमुनाती,छटपटाती रात

तेरे तीरे-नीमकश-सी ख़लिश देती रात


यह अंधेरा घन अंधेरा,धुप अंधेरी रात

डबडबाती, सुबकती-सी मात खाई रात


जुल्फ के साये में ठिठकी, तमन्ना-सी रात

तेरी पेशानी पे चमकी, इक अदा-सी रात


दिल में मेरे चुप पड़ी थी, अब तलक जो बात

जुबां पर आकर अटकती अटकती-सी बात

            दस वर्ष पहले

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