Tकोई आया है दबे पांव जरा चुप भी रहो
चुपके चुपके से दबे पांव जरा चुप भी रहो
कुछ न कुछ लम्हः लम्ह: बोलते रहे होगे
उनका दिल अपनी वफा तौलते रहे होगे
बंद रखा था जिसे खोलते रहे होगे
बस आज कुछ न कहो, आज इसे कहने दो
इसको अपने ही खयालात में बस बहने दो
गुफ्तगु इसकी, बस खयालों में चिराग जलें
जिसके साये में तिरे मेरे, सब सुराग पलें
देखो समझो जरा, सुनो भी जरा,चुप भी रहो
कोई आया हैै दबे पांव, जरा चुप भी रहो
अंघेरा आया, तेरी सांसों का अहसास लिए
तू हंसती हुई बिजली-सी कौंध जाती है
तेरी हथेलियों की गर्मियां, मुझे छूकर
अंधेरी रात को सकून-सा दे जाती है
तेरी जुल्फों़़ से गुजरती हुई ये मौजे-सबा.
उदास रात को खुशरंग बना जाती है
तेरी आंखों के उजालों मे उतर जाता हूं
तेरे होंठों पे फसाने-सा ठहर जाता हूं
तेरा चेहरा मेरे कांधों पे यूं है ठहरा हुआ
शाम को लौटेपरिंदे ने बनाया डेरा
देखो समझो जरा, सुनो भी जरा,चुप भी रहो
कोई आया है दबे पांव जरा चुप भी रहो !
तीसरा,शेष हिस्सा
बदलती जाती तपिश,आंच में तूझे छू कर
पिघलता जाता हूं मैं वर्फ-सा तूझे छूकर
बीतता जाता हूं मैं आज तूझे छू छू कर
रीतता जाता हूं मैं आज तूझे छू छू कर
कहां-कहां से गुजर जाता हूं तूझे छू कर
कभी पारे-सा बिखर जाता हूं तूझे छू कर
भूल जाता हूं मैं दुनियां-जहां के वीराने
न कुछ वजूद मेरा अौर ना ही अफसाने
बस पड़ा रहने दो चेहरा यूं मेरे कांधों पर
जैसे ठहरा हुआ हो वक्त मेरे कांधों पर
इस हकीकत को आज रात बदल जाने दो
थम गई आज सहर आज तो थम जाने दो
देखो समझो जरा,सुनो भी जरा,चुप भी रहो
कोई आया है दबे पांव, जरा चुप भी रहो!!
नौ वर्ष पहले

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