देख तोदिल कि जां से उठता है
ये धुंआं-सा कहां से उठता है!
शायद मीर की इस गजल को अगर मेंहंदी हसन की आवाज़ में सुनी है तो याद करें, न सुनी हो तो कोशिश करें ,सुन लेेगे तो जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ेगी
फिर उठे आज उस गली से हम
जैसे कोई जहां से उठता है!
आखें मुश्किल से छलछलाती है अब तो मौके ही नहीं अाते हैं!
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